मम्मी-पापा थे अनपढ़ किसान, टाट-पट्टी पर बैठकर पढऩे वाला बबुआ बन गया कलेक्टर

आलोक पाण्डेय
कानपुर. काबिल बनो-कामयाबी झक मारकर करीब आएगी। फिल्म थ्री-इडियट का यह डॉयलाग कानपुर के नए कलेक्टर/जिलाधिकारी सुरेंद्र सिंह पर सटीक है। एक वक्त था, जब सुरेंद्र के कच्चे घर में दो वक्त की रोटी का मुकम्मल इंतजाम नहीं था। माता-पिता अनपढ़ किसान थे, जैसे-तैसे गृहस्थी की गाड़ी को धकेल रहे थे। खुद अनपढ़ थे, लेकिन जिंदगी की मुश्किलों ने समझा दिया था कि बच्चों को जरूर पढ़ाना है-काबिल बनाना है। इसी धुन में स्कूल के आंगन में पैर भी नहीं रखने वाला और तमाम मुश्किलों से लड़ता-जूझता यह दंपती अपने लाडलों को पढ़ाता चला गया। छोटा बबुआ कलेक्टर बनना चाहता था, इसलिए उम्दा दर्जे की तमाम नौकरियां मिलीं, लेकिन मंजिल हासिल करने की ललक थी। आखिरकार अनपढ़ किसान का बबुआ एक दिन कलेक्टर बन गया। यही बबुआ आज कानपुर का कलेक्टर बनकर आया है।
गांव के स्कूल में टाट-पट्टी पर बैठकर आठवीं तक पढ़ाई हुई
IAS SURENDRA SINGH
मथुरा की महावन तहसील के सैदपुर गांव में गरीब किसान महेंद्र सिंह के परिवार में वर्ष 1982 में छोटा बेटा पैदा हुआ तो खुशियों के ढोल पीटे गए। चहकते हुए पिता के मुंह से निकला कि कलेक्टर आया है। कुछ लोग हंस पड़े.. शायद ये लोग एक गरीब किसान के सपने को मुंगेरीलाल के सपनों से जोडक़र देख बैठे थे। माता-पिता अनपढ़ थे, इसलिए पढ़ाई की कीमत ज्यादा समझते थे। उन्होंने दोनों बच्चों को खूब पढ़ाया-आगे बढ़ाया। गांव के प्राइमरी स्कूल में फटा बस्ता लेकर दोनों भाई जाते थे और टाट-पट्टी पर बैठकर ककहरा सीखते थे। यह दौर आठवीं दर्जा तक चला। जीतेंद्र आगे की पढ़ाई करने के लिए दिल्ली चले गए और बाद में मास्टर बन गए। सुरेंद्र अपनी मंजिल का रास्ता तराशने में जुटा था। गांव में आठवीं के बाद पढ़ाई का इंतजाम नहीं था। अब सुरेंद्र को गांव छोडऩा था। दिल्ली का रास्ता करीब दिखा, जहां भाई मास्टरी कर रहे थे। सुरेंद्र लपककर दिल्ली पहुंच गए और इंटरमीडियट तक पढ़ाई वहीं हुई।
बचपन से कलेक्टर बनने का सपना संजोया था, जोकि पूरा हुआ
IAS SURENDRA SINGH
बहरहाल, जीतेंद्र सिंह का छोटा भाई सुरेंद्र सिंह पढऩे में होशियार था। जैसे-जैसे बढ़ता गया, काबिलियत निखरती गई। एक दिन गांव की महफिल में प्रधान ने सुरेंद्र से पूछा कि बड़े होकर क्या बनना है। इत्तेफाक देखिए- अनपढ़ किसान के बेटे सुरेंद्र ने वही जवाब दिया, जो उसके जन्म के समय पिता ने चहकते हुए कहा था। सुरेंद्र बोला कि सिर्फ कलेक्टर बनूंगा और कुछ नहीं। यह सवाल आगे भी जिंदगी में कई मर्तबा आया, लेकिन जवाब नहीं बदला। दिल्ली में इंटरमीडियट की पढ़ाई पूरी करने के बाद सुरेंद्र जयपुर चले गए, जहां उन्होंने महाराजा कालेज से बीएससी और एमएससी उत्तीर्ण किया। एमएससी में सुरेंद्र ने विश्वविद्यालय में अपनी काबिलियत का डंका बजा दिया था, उन्हें रिकार्ड नंबर के साथ गोल्ड मेडल हासिल हुआ था।
नौकरियों को ठोकर मारते गए, क्योंकि कलेक्टर बनने की धुन सवार थी
IAS SURENDRA SINGH
महाराजा कॉलेज से एमएससी के बाद सुरेंद्र को एसएसबी (सर्विसेज सेलेक्शन बोर्ड) के जरिए एयरफोर्स की नौकरी मिली, लेकिन ज्वॉइन करने नहीं गए। इसी दौरान कुछ समय बीकानेर में बच्चों को कोचिंग देने लगे। ओएनजीसी में बड़े पद पर नौकरी मिली, लेकिन आंखों में कलेक्टर बनने का सपना तैर रहा था। अब कलेक्टर बन चुके सुरेंद्र कहते हैं कि पढ़ाई-लिखाई और कॅरियर निखारने के दौर में कलेक्टर बनना एक जुनून की तरह सिर पर सवार था। सिर्फ यही सोचता था कि कोई भी इम्तिहान दूं-कोई भी पढ़ाई करूं, लेकिन कलेक्टर ही बनना है। इस सपने को सुरेंद्र ने अपनी जिंदगी की मंजिल बना लिया था। एक-दो नहीं, तीन मर्तबा सुरेंद्र का चयन पीसीएस के लिए हुआ। जैसे हालात में सुरेंद्र ने बचपन और किशोरावस्था के दिन गुजारे थे, कोई और होता तो पीसीएस की नौकरी को ज्वाइन कर लेता….. लेकिन यह सुरेंद्र सिंह थे, जिद्दी सुरेंद्र सिंह।
आखिरकार 2005 में कामयाबी मिली,देश में 21वीं रैंक हासिल हुई
IAS SURENDRA SINGH
मेहनत-लगन के आगे बड़ी-बड़ी हसरतें हासिल होती हैं, कलेक्टर की कुर्सी क्या बला थी। वर्ष 2005 में सुरेंद्र का सपना पूरा हुआ। अनपढ़ किसान का छोटा बबुआ अब कलेक्टर बन गया था। उसे देश में 21वीं रैंक हासिल हुई थी, यूपी में अव्वल नंबर। सुरेंद्र खुद को आगे बढ़े, अपने साथियों को भी आगे बढऩे में मदद करते रहे। सुरेंद्र का फलसफा है कि ज्ञान बांटने से कम नहीं होता, इसलिए सिविल की तैयारी के दौरान वह अपने नोट्स दोस्तों के साथ शेयर करते थे। ऐसे में दोस्तों की जानकारी बढ़ती थी और सुरेंद्र को भी नए-नए विषय पर नए तथ्य हासिल होते थे। इसी का नतीजा था कि सुरेंद्र और उनके दोनों दोस्त आईएएस बन गए।
आज भी पसंद है चूल्हे की रोटी और हरी सब्जी
IAS SURENDRA SINGH
अभावों के दौर में कामयाबी की कहानी लिख चुके सुरेंद्र सिंह अब कलेक्टर बन चुके हैं, ठाठ हैं, लेकिन उनकी भदेस देसी अंदाज नहीं गया। उन्हें आज भी मिट्टी के चूल्हे पर बनी रोटी पसंद है। मांसाहार से दूर रहते हैं। हरी सब्जियां शौक के साथ खाते हैं। देसीपन यूं समझिए कि कलेक्टर साहेब के बंगले में दूध आज भी चूल्हे पर गर्म किया जाता है। रोजाना पांच घंटे की नींद लेने वाले सुरेंद्र सिंह 19 घंटे काम करते हैं।
पापा-मम्मी आदर्श हैं, परिवार निजी प्राथमिकता
IAS SURENDRA SINGH
सुरेंद्र सिंह के आदर्श उनके माता-पिता हैं। मां अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन पिता से प्रेरणा लेते रहते हैं। सुरेंद्र बताते हैं कि आईएएस में चयन के बाद गांव में सम्मान समारोह आयोजित किया गया। पहली मर्तबा पिता को मंच पर स्थान मिला। वह तस्वीर जेहन में सदैव ताजा रहती है। पहली बार कलेक्टर बबुआ के घर में मां आई तो रो पड़ी थी। यह खुशी के आंसू थे, जिसकी कीमत एक मां और उसका बेटा ही समझ सकते हैं। नौ साल पहले 03 फरवरी को मेरठ के गरिमा के साथ सुरेंद्र सिंह का सात जन्म का रिश्ता जुड़ गया। परिवार में दो बेटियां जिया और दिया हैं। सुरेंद्र की जिंदगी में दो प्राथमिकता हैं, निजी प्राथमिकता परिवार-बेटियों को काबिल बनाना और दूसरी प्राथमिकता देश के नौजवानों को काबिलियत का रास्ता दिखाना।
Collector Surendra Singh
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