बिन पानी सूने घाट, कैसे दिखें सजावट के ठाठ

कानपुर: नदी का असली सौंदर्य स्वच्छ, प्रदूषण रहित और कल-कल करता पानी है। पुरानी कहावत भी है बिन पानी सब सून। सोमवार को मकर संक्रांति पर मुख्य स्नान है। लाखों लोग गंगा में डुबकी लगाएंगे, मगर हर वर्ष की तरह इस बार भी सूखी गंगा को देखकर श्रद्धालुओं के मन में टीस उठेगी। पांच वर्षो में सौंदर्यीकरण के नाम पर करोड़ों रुपये मां गंगा की अविरलता के नाम पर बहा दिए गए, मगर लाख टके का सवाल यह है कि सूने घाटों पर बिना पानी आखिर ठाठ कैसे होंगे।

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अब तक 20 करोड़ खर्च

गंगा की स्वच्छ रखने में जनसहभागिता बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार ने नदी किनारे बसे शहरों में घाटों के सौंदर्यीकरण का फैसला लिया था। प्रदेश में इसके तहत कानपुर, बिजनौर, इलाहाबाद, फतेहपुर और फर्रुखाबाद में पहले चरण का काम शुरू किया गया था। हालांकि धन की उपलब्धता के कारण केवल कानपुर और बिजनौर में ही काम शुरू हो सका था। कानपुर में दस पुराने घाटों सरसैया घाट, परमट घाट, गुप्तार घाट, भैरोघाट, मेस्कर घाट, गोला घाट, मैग्जीन घाट, सिद्धनाथ घाट, भगवतदास घाट और कोयला घाट के अलावा बिठूर और उन्नाव के घाटों का सौंदर्यीकरण हो रहा है। करीब 20 करोड़ रुपये खर्च करके घाटों का चौड़ीकरण व पक्का किया जाना, टॉयलेट ब्लाक बनाना, हाईमास्क लाइटों से रोशनी की उचित व्यवस्था और महिलाओं के लिए कपड़े बदलने के लिए चेंजिंग रूम बनाए गए। इसके अलावा घाटों पर मुंडन व कर्णछेदन का चबूतरा निर्माण भी कराया गया।

यह है हकीकत

करोड़ों खर्च करके इन घाटों पर सौंदर्यीकरण के नाम पर तानाबाना तो बुन दिया गया, लेकिन यह कभी किसी ने नहीं सोचा कि बिना पानी के इन घाटों का कैसा सौंदर्य, मेस्कर और सिद्धनाथ घाट पर गंगा घाटो से 100 मीटर दूर है। इसके अलावा कोयला घाट, गोलाघाट में पानी दूर है। वीरन पड़े घाटों की तस्वीर भयावह दिखाई देती है। बिठूर में घाट निर्माण के चलते गंगा पहली बार घाटों से दूर हैं। जागरण पड़ताल के दौरान जो खामियां देखने को मिली, वह सचमुच पूरी व्यवस्था को सवालों के घेरे में खड़ी करती हैं। मेस्कर घाट में महिलाओं के लिए बने चेंज रूम करीब 150 मीटर दूर है। ऊपर से ऊबड़ खाबड़ रास्ते में कोई महिला वहां जाने की कोशिश करे तो दुर्घटना का शिकार हो सकती है।

शुक्लागंज से होकर बह रही मुख्य धारा

यह प्रकृति ही है कि मां गंगा के नाम पर जिन घाटों के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, वहां से गंगा रूठी नजर आ रही है। मुख्य धारा शुक्लागंज की ओर चली गई है।

बैराज से नहीं मिलता भरपूर पानी

गंगा में पानी की कमी का प्रमुख कारण बैराज है। बैराज से आगे पानी तभी छोड़ा जता है, जब न्यूनतम जलस्तर 113.1 मीटर से अधिक होता है। इस स्तर को बनाए रखने के लिए आम दिनों में चार से पांच हजार क्यूसेक पानी ही छोड़ा जाता है, जबकि आवश्यकता रोजाना आठ हजार क्यूसिक है। इतनी मात्रा में पानी केवल तभी छोड़ा जाता है, जब इलाहाबाद में पानी की जरूरत होती है।

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